Corruption is more harmful than nuclear radiation. Radiation is very harmful when it enters the body but corruption pollutes the whole system of the society like a virus corrupt the soft wares and blocks all the activities of any kinds of hardwares. It affacts the psychology of the socity and destroy all the norms and values of a civilized society.
रेखा की लंबाई को और कितना घटाओगे। कितने बिंदु, कितने किरण पुंज, इन बिंदुमय रेखाओं मे मिलाओगे। त्रिभुज, चतुर्भुज, बहुभुज, सम, ऋजु और न्युन, ना जाने कितने कोण और भुजायें बनाओगे। कितने लम्ब और स्पर्श रेखाओं से इस वृत को विवृत दिखाओगे। द्विआयामी, त्रिआयामी, बहुआयामी, कितने त्रिविमीय चित्र सजाओगे। रेखा चित्र, माप चित्र, मान चित्र से कब तक मन बहलाओगे। रेखायें तिलमिलाने लगी हैं। चित्र विद्रूपता कुँठा और क्रुरता झलकाने लगे हैं। रंगों के चटकीले मेल से कब तक लुभाओगे। कब तक अंग सौष्ठव से सहज पृवृतियों को उकसाओगे। कमप्युटर और एनीमेशन की कला से, इन ठूँठ और बेजान सी, जीवित गठरियों की गड्ढों मे धँसी बेपनीली आँखों में, कब तक सपने जगाओगे। जातीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की सीमा रेखाओं में, भूख से कुलबुलाते पेट को, कब तक गौरव और गरीमा के पाठ पढाओगे। मल्टीनेशनल को और कितना मल्टीप्रोफेसनल बनाओगे। धर्म, जाति, कुल, वंश परम्परा, भाषा भेद और रंग भेद से, कितने और नये बाजार सजाओगे। प्रतिद्वद और प्रतियोगिता के नाम पर कितने और नये विज्ञापन दिखाओगे। पूर्व की लाली को देखो, नया सूरज निकलने वाला है।
बाल सूर्य की प्रथम रश्मि मुस्कराई मंदिम मंदिम, उषाकाल के आँचल में, मानवता का मनभावन गूँज उठा सहगान। हो मुदित प्रकृति ने किया नवजीवन आव्हान। इतिहास में बेजोड है, नव भारत का मोड है, सन उन्नीस सौ सात का निर्मल प्रभात। लायलपुर पंजाब में हुये भगतसिंह अवदात। बंगा में रहता था सिक्ख किसनसिंह परिवार। भगतसिंह जन्मे वहाँ सताईस सितम्बर शनिवार। आजादी के मान को सींचा जिसने खून से। फांसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से। अनवरत समय की धारा, साम्राज्यवाद का कुटिल इशारा, जब जुल्म की आँधी लाता है। शोषक सत्ता का शैतान जब कहर पीडित पर ढाता है। सभ्यता का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है। इंकलाब की ले तलवार तब भगतसिंह आ जाता है। कफन बांध निज नौजवान जब जब ललकारा है। तानाशाही ताकत का मनोबल चीखा चित्कारा है। क्रान्तिदूत भगतसिंह भूला कभी न जायेगा। क्रान्तिपथ का हर पथिक उसे श्रद्धा सुमन चढायेगा।
रोटी! रोटी! रोटी? वे रोटी माँग रहे थे। और, उनके मांगने पर उनको वही मिल रहा था, जो अक्सर तंग आने पर, ग्वाले अपनी डकराती गाय, भैंसों को दिया करते हैं। वे मरते हैं। मगर मांग कर क्यों? क्या वे नहीँ जानते, कि ये दाता मांग कर नहीँ लाये।
विश्वास वट वृक्ष सा विशाल कोई वृक्ष है। वट वृक्ष की जडें सदैव जमीन से जुडने की कामना करती हैं। विश्वास की जडें अदृश्य रह कर मन की गुहाओं में समा जाती हैं। वट वृक्ष हवा के थपेडों का सामना कर सालों साल अविचल शान से जीता है। विश्वास घात, प्रतिघात से घबरा कर तुरंत धराशायी हो जाता है।
कविता! किसका इन्तजार है तुम्हेँ? ... कवि ढूँढती हो... नरेगा का मेट बना है वह ... पर अधिकारी कहते हैँ सोलह आने कवि है वह ... पूरा पागल! मस्टरोल खाली, खायेगा कहाँ से? भुखोँ मरेगा, मारेगा हमेँ भी... अरे लालु चारा खागया ... राजा टू जी पचागया, हरामी दो नाम ही खाली दिखागया... क्योँ है न कवि? अगले पखवाड़े इसे हटादेना, कोई सीधा शरीफ सा मेट लगालेना... बिँब प्रतिबिँब,कला और छंद नहीँ हाजरी लगाने को मेट चाहिये। इसे लिखनेदो कविता,पागल कहीँ का! देवता को भी भेँट चाहिये!!
This poem indicates towards the real picture of the corruption in the Indian bureaucratic system.poet had been rebuked for his honesty. it is an evil for the officers that he does not fill the false entry on the work rolls of NREGA. poet is not qualified in the art of forgery so he would be thrown away from this system.
A new series of songs by pyarelal Bhamboo is available on the facebook in the group 'Geet-Gazal'you can enjoy those painful Hindi songs and give your opinion on the page 'Pyarelal Bhamboo -writer from May 2012.
एक सपना था जो टूट गया, एक साथी था जो रूठ गया। चलना नहीँ भुलेँ हैँ पाँव, भ्रम ही सही, मँजिल की तलाश मेँ, एक सम्बल था राह का वह भी छूट गया॥ सपने तो बनते हैँ बिगड़ते है, साथी भी लड़ते हैँ झगड़ते है, मँजिलोँ का ठौर और ठिकाना तो हर कदम के साथ बदलता है। सुदूर अटक जाती है निगाह क्षितिज के नाम पर, फासला तो हर कदम के साथ फिसलता है॥ सम्बल ही तो है जो फिर नये सपने बुनता है। एकाकी के अधुरेपन को मिटाने फिर नये साथी चुनता है॥ चिराग उम्मीदोँ का यूँ न बुझाओ कि सपने भी डर से थर्राने लगेँ। अब बस भी करो, बहूत लूटा है आस्था और विश्वास के नाम पर, ऐसा न हो कि डाकू और लूटेरे भी तुम्हारी बेहयाई पर शर्माने लगेँ॥
Corruption is more harmful than nuclear radiation. Radiation is very harmful when it enters the body but corruption pollutes the whole system of the society like a virus corrupt the soft wares and blocks all the activities of any kinds of hardwares. It affacts the psychology of the socity and destroy all the norms and values of a civilized society.
ReplyDeleteरेखा की लंबाई को और कितना घटाओगे। कितने बिंदु, कितने किरण पुंज, इन बिंदुमय रेखाओं मे मिलाओगे। त्रिभुज, चतुर्भुज, बहुभुज, सम, ऋजु और न्युन, ना जाने कितने कोण और भुजायें बनाओगे। कितने लम्ब और स्पर्श रेखाओं से इस वृत को विवृत दिखाओगे। द्विआयामी, त्रिआयामी, बहुआयामी, कितने त्रिविमीय चित्र सजाओगे। रेखा चित्र, माप चित्र, मान चित्र से कब तक मन बहलाओगे। रेखायें तिलमिलाने लगी हैं। चित्र विद्रूपता कुँठा और क्रुरता झलकाने लगे हैं। रंगों के चटकीले मेल से कब तक लुभाओगे। कब तक अंग सौष्ठव से सहज पृवृतियों को उकसाओगे। कमप्युटर और एनीमेशन की कला से, इन ठूँठ और बेजान सी, जीवित गठरियों की गड्ढों मे धँसी बेपनीली आँखों में, कब तक सपने जगाओगे। जातीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की सीमा रेखाओं में, भूख से कुलबुलाते पेट को, कब तक गौरव और गरीमा के पाठ पढाओगे। मल्टीनेशनल को और कितना मल्टीप्रोफेसनल बनाओगे। धर्म, जाति, कुल, वंश परम्परा, भाषा भेद और रंग भेद से, कितने और नये बाजार सजाओगे। प्रतिद्वद और प्रतियोगिता के नाम पर कितने और नये विज्ञापन दिखाओगे। पूर्व की लाली को देखो, नया सूरज निकलने वाला है।
ReplyDeleteबाल सूर्य की प्रथम रश्मि मुस्कराई मंदिम मंदिम, उषाकाल के आँचल में, मानवता का मनभावन गूँज उठा सहगान। हो मुदित प्रकृति ने किया नवजीवन आव्हान। इतिहास में बेजोड है, नव भारत का मोड है, सन उन्नीस सौ सात का निर्मल प्रभात। लायलपुर पंजाब में हुये भगतसिंह अवदात। बंगा में रहता था सिक्ख किसनसिंह परिवार। भगतसिंह जन्मे वहाँ सताईस सितम्बर शनिवार। आजादी के मान को सींचा जिसने खून से। फांसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से। अनवरत समय की धारा, साम्राज्यवाद का कुटिल इशारा, जब जुल्म की आँधी लाता है। शोषक सत्ता का शैतान जब कहर पीडित पर ढाता है। सभ्यता का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है। इंकलाब की ले तलवार तब भगतसिंह आ जाता है। कफन बांध निज नौजवान जब जब ललकारा है। तानाशाही ताकत का मनोबल चीखा चित्कारा है। क्रान्तिदूत भगतसिंह भूला कभी न जायेगा। क्रान्तिपथ का हर पथिक उसे श्रद्धा सुमन चढायेगा।
ReplyDeleteरोटी! रोटी! रोटी? वे रोटी माँग रहे थे। और, उनके मांगने पर उनको वही मिल रहा था, जो अक्सर तंग आने पर, ग्वाले अपनी डकराती गाय, भैंसों को दिया करते हैं। वे मरते हैं। मगर मांग कर क्यों? क्या वे नहीँ जानते, कि ये दाता मांग कर नहीँ लाये।
ReplyDeleteविश्वास वट वृक्ष सा विशाल कोई वृक्ष है। वट वृक्ष की जडें सदैव जमीन से जुडने की कामना करती हैं। विश्वास की जडें अदृश्य रह कर मन की गुहाओं में समा जाती हैं। वट वृक्ष हवा के थपेडों का सामना कर सालों साल अविचल शान से जीता है। विश्वास घात, प्रतिघात से घबरा कर तुरंत धराशायी हो जाता है।
ReplyDeleteकविता! किसका इन्तजार है तुम्हेँ? ... कवि ढूँढती हो... नरेगा का मेट बना है वह ... पर अधिकारी कहते हैँ सोलह आने कवि है वह ... पूरा पागल! मस्टरोल खाली, खायेगा कहाँ से? भुखोँ मरेगा, मारेगा हमेँ भी... अरे लालु चारा खागया ... राजा टू जी पचागया, हरामी दो नाम ही खाली दिखागया... क्योँ है न कवि? अगले पखवाड़े इसे हटादेना, कोई सीधा शरीफ सा मेट लगालेना... बिँब प्रतिबिँब,कला और छंद नहीँ हाजरी लगाने को मेट चाहिये। इसे लिखनेदो कविता,पागल कहीँ का! देवता को भी भेँट चाहिये!!
ReplyDeleteThis poem indicates towards the real picture of the corruption in the Indian bureaucratic system.poet had been rebuked for his honesty. it is an evil for the officers that he does not fill the false entry on the work rolls of NREGA. poet is not qualified in the art of forgery so he would be thrown away from this system.
ReplyDeleteA new series of songs by pyarelal Bhamboo is available on the facebook in the group 'Geet-Gazal'you can enjoy those painful Hindi songs and give your opinion on the page 'Pyarelal Bhamboo -writer from May 2012.
ReplyDeleteGeet-Gazal
ReplyDeleteA new series of love songs avilable on the facebook in the group 'Geet-GAZAL'
I like all these poems. So much realistic and impressive.
ReplyDeleteI think that a new beginning improve my work. I shall try to write my songs in the blog 'The writer'
ReplyDeleteएक सपना था जो टूट गया, एक साथी था जो रूठ गया। चलना नहीँ भुलेँ हैँ पाँव, भ्रम ही सही, मँजिल की तलाश मेँ, एक सम्बल था राह का वह भी छूट गया॥ सपने तो बनते हैँ बिगड़ते है, साथी भी लड़ते हैँ झगड़ते है, मँजिलोँ का ठौर और ठिकाना तो हर कदम के साथ बदलता है। सुदूर अटक जाती है निगाह क्षितिज के नाम पर, फासला तो हर कदम के साथ फिसलता है॥ सम्बल ही तो है जो फिर नये सपने बुनता है। एकाकी के अधुरेपन को मिटाने फिर नये साथी चुनता है॥ चिराग उम्मीदोँ का यूँ न बुझाओ कि सपने भी डर से थर्राने लगेँ। अब बस भी करो, बहूत लूटा है आस्था और विश्वास के नाम पर, ऐसा न हो कि डाकू और लूटेरे भी तुम्हारी बेहयाई पर शर्माने लगेँ॥
ReplyDeleteMy old poems.I shall try to collect them in a collection with a suitable title.
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