Thursday, September 27, 2018

शहीदे -आजम भगतसिंह की याद में..

॰॰॰-  शहीदे-आजम भगतसिँह की याद मेँ-॰॰॰

--
बाल सूर्य की प्रथम रश्मि,
मुसकायी मंदिम मंदिम।
उषा-काल के आँचल मेँ,
आसमान के विकल विरल मेँ।
मानवता का मन भावन।
गूँज उठा सहगान।
हो मुदित प्रकृति ने किया नव जीवन आव्हान।

इतिहास मेँ बेजोड़ है।
नव भारत का मोड़ है।
सन उन्नीस सौ सात का उर्मिल प्रभात।
लायलपुर पंजाब मेँ हुये भगतसिँह अवदात।
बंगा मेँ रहता था, सरदार किशनसिँह परिवार।
भगतसिँह जन्मे वहाँ अट्ठाईस सितम्बर शनिवार।

मेहनतकस के मान को सीँचा जिसने खून से।
फाँसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से।
शोषण की भट्टी मेँ संकटग्रस्त हो सर्वहारा।
साम्राज्यवादी खेमा सारा,जब जुल्म की आँधी लाये।
शोषक सत्ता के शैतान जब कहर पीड़ित पर ढायेँ।

लोकतन्त्र का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है।
इंकलाब की ले हूँकार तब भगतसिँह आ जाता है।

कफन बाँध निज नौजवान, जब जब ललकारा है।
तानाशाही ताकत का मनोबल सदा चीखा चित्कारा है।
क्रांतिदूत भगतसिँह भूला कभी न जायेगा।
क्रांति पथ का हर पथिक उन्हेँ श्रद्धा सुमन चढायेगा।
........ प्यारेलाल भाम्बू .  ...

नहीँ भूलेगा, कांटोँ के आगोश मेँ, सहज चटक कर खिलना। डाली के शिखर पर, शान से इठलाने को, कब रोक पाता है, तीक्ष्ण धार वाले, कांटोँ का हिलना॥ क्रुरता के कषैले आँसुओँ को पीकर, जीवन की धूप को, चटक लाल रंग देने, गुलाब के फूल से, खुशहाली के सुरुचिपूर्ण, साम्यवादी समाज के सपने को साकार करने वाले, असंख्य शहीदोँ की शहादत को गौरवान्वित करने, कांटोँ वाली झाड़ी मेँ खिलता रहेगा, यह गुलाब का फूल।


जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Wednesday, September 26, 2018

नफरत की बुनियाद. ‌.

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

गलाउकस

गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
 एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
 कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
 उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
 ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥

गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
 विद्रोह का पाठ,
 जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥

गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
 नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो  अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥

॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

ठूंठ

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

न मानुंगा हार..

ठूँठ से नीरस जीवन से दूर,
 कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
  ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
    लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
 पानी ही तो है,
 जो हर जीवन का आधार है॥
 नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
 फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
 खुद को मिटा,
 यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
 पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
 जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
  अरे ओ पागल दीवाने,
 क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
  यह दुनिया न समझेगी,
 तेरी कुर्बानी का गम॥
 पीव पीव पुकारो,
 उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
 अन्याय के आतप से झुलसे,
 मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
 कितने ढाओगी जुल्म,
 ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
 समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
 तेरी हूक मेँ,
 मैँ भी सुर मिलाउँगा।
  न मानुंगा हार,
 मैँ पागल कवि,
 इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥

पहली बार...

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Monday, September 17, 2018

जुमलेबाज. ‌.

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।पर यथार्थ कि...

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि...
: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है। पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने, कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ। उड़ती धूल के दर्पण मेँ, दहकत...

आ तुझे खुशी का सहज आभास. ‌.

आ तुझे खुशी का सहज आभास कराने वाली,
 किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,

हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
 अन्दाज सिखाऊँ॥

भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,

घनचक्कर बने इन्सान ने,

धर्म, राष्ट्रीयता,
 जाति और प्रजाति के नाम से,

स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
 रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥

आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।

गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
 
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥

अरे ओ गुँगे,
 पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------

नफरत की बुनियाद...

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

नमक के ढेलों से...

नमक के ढेलोँ से,
हीरे तराशने चले हो।
झूठ और फरेब के बाजार मेँ,
सत्य को तलाशने चले हो।
चेहरोँ पर लिखी,
चिन्ता की लकीरेँ,
दर्द मेँ डूबी,
जंगी फन फरेबी,
हमदर्द तकरीरेँ,
यहाँ इल्म सियासतदान,
बाजाब्ता,
जिन्सी माल की तरह परोसते हैँ।
अदना सा,
 बैजहार सच का पुतला,
बाजार के कोने वाले पीपल की छाँव मेँ,
बैसाखी पर ठुड्डी टिकाये,
टुकर टुकर,
सलतनत ए आवाम का अंजाम देख रहा है।
देखना चाहते हो,
तो देखलो,
जल, जंगल और जमीन से खदेड़े गये,
उस मायुस इन्सान के कटे पाँव पर,
सत्य की पीड़ाओँ का इतिहास लिखा है।

गलाउकस...

गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
 एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
 कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
 उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
 ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥

गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
 विद्रोह का पाठ,
 जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥

गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
 नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो  अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥

॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

ठूंठ. ‌.

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

रेखा की लंबाई को...

रेखा की लम्बाई को और कितना घटाओगे।
कितने बिँदु, कितने किरण पूँज, इन बिँदुमय रेखाओँ मेँ मिलाओगे॥
त्रिभुज, चतुर्भुज, बहुभुज, सम, ऋजु और न्युन,
ना जाने कितने कोण और भुजायेँ बनाओगे।
कितने लम्ब और स्पर्श रेखाओँ से,
इस वृत को विवृत दिखाओगे।
द्विआयामी, त्रिआयामी, बहुआयामी,
कितने त्रिविमीय चित्र सजाओगे॥
रेखा चित्र, माप चित्र, मान चित्र से कब तक मन बहलाओगे।
रेखायेँ तिलमिलाने लगी हैँ,
चित्र विद्रुपता, कुँठा और क्रुरता झलकाने लगे हैँ,
रंगोँ के चटकीले मेल से कब तक लुभाओगे।
कब तक अंग सौष्ठव से सहज प्रवृतियोँ को उकसाओगे॥
कमप्युटर और एनिमेशन की कला से,
इन ठूँठ और बेजान सी, जीवित गठरियोँ की, गड्ढोँ मेँ धँसी,
बेपनीली आँखोँ मेँ कब तक सपने जगाओगे।
जातीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की सीमा रेखाओँ मेँ,
भूख से कुलबुलाते पेट को,
कब तक गौरव और गरीमा के पाठ पढाओगे॥
मल्टी नेशनल को और कितना मल्टी प्रोफेसनल बनाओगे।
धर्म, जाति, कुल, वंश परम्परा, भाषा भेद और रंग भेद से,
कितने और नये बाजार सजाओगे॥
प्रतिद्वन्द और प्रतियोगिता के नाम पर,
कितने और नये विज्ञापन दिखाओगे।
पूर्व की लाली को देखो, नया सूरज निकलने वाला है।
- प्यारेलाल भाम्बू-

जुमलेबाज...

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

मृग मरीचिका...

मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने,

कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ।
उड़ती धूल के दर्पण मेँ,
दहकते अंगारोँ सी,
विचलित इन किरणोँ ने,
पानी से लबालब झील की झलकी दिखा,
कितनी बार प्यासे मृगोँ से कुलाचेँ लगवाई हैँ॥

 यथार्थ के जलते टीलोँ से टकरा कर मर जाना,
बेहतर है शायद,
इस आभासी झील के झिलमिलाते,
बहुरुपिये पानी से।

डकैतोँ की डकैती,
शायद नहीँ है बुरी,
शब्दोँ के मकड़जाल मेँ उलझी,
इस मायावी विकास की कहानी से॥

निश्चय ही कौए की चोँच से छीना जायेगा,
रोटी का टुकड़ा।
काश, समझ पाते,
 कि प्रवंचना की तलवार है,

मीठे सुर और संगीत  का यह मुखड़ा॥

तानसेन बनने के मोह मेँ,

हर बार सच मानलेते हो,

चालाक लोमड़ी की प्रशँसा और वादोँ को।
फिर से समझना होगा,
इन शब्दोँ के अर्थ और इरादोँ को॥

छलना के छलछलाते सागर मेँ कब तक डुबकी लगाओगे।

मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो,

कैसे तट के कगार को छू पाओगे?

अब हाथ पैर हिलाने ही होँगे,

लहरोँ से हौसलेँ टकराने ही होँगे,
देख,
आग मेँ अपना जिश्म जलाकर परवाना,

शमाँ के गरुर को चाहता है झुकाना,

रक्त की लालिमा ले,
अंधेरे के आँचल को चिर,

वह देख,
 नया सूरज निकल आया है।

चिड़ियोँ की चहचहाट मेँ,
जालिमोँ से लोहा लेने,

बलात्कार की शिकार,
उषा की अरुणाई ने,

लाने को नया इँकलाब,
हाथोँ मेँ लाल झँडा उठाया है॥
--------  प्यारेलाल भाम्बू ---------