Monday, September 17, 2018

ठूंठ. ‌.

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

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