पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

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