नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

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