आ तुझे खुशी का सहज आभास कराने वाली,
किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,
हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
अन्दाज सिखाऊँ॥
भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,
घनचक्कर बने इन्सान ने,
धर्म, राष्ट्रीयता,
जाति और प्रजाति के नाम से,
स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥
आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।
गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥
अरे ओ गुँगे,
पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------
किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,
हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
अन्दाज सिखाऊँ॥
भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,
घनचक्कर बने इन्सान ने,
धर्म, राष्ट्रीयता,
जाति और प्रजाति के नाम से,
स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥
आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।
गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥
अरे ओ गुँगे,
पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------

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