Monday, September 17, 2018

नमक के ढेलों से...

नमक के ढेलोँ से,
हीरे तराशने चले हो।
झूठ और फरेब के बाजार मेँ,
सत्य को तलाशने चले हो।
चेहरोँ पर लिखी,
चिन्ता की लकीरेँ,
दर्द मेँ डूबी,
जंगी फन फरेबी,
हमदर्द तकरीरेँ,
यहाँ इल्म सियासतदान,
बाजाब्ता,
जिन्सी माल की तरह परोसते हैँ।
अदना सा,
 बैजहार सच का पुतला,
बाजार के कोने वाले पीपल की छाँव मेँ,
बैसाखी पर ठुड्डी टिकाये,
टुकर टुकर,
सलतनत ए आवाम का अंजाम देख रहा है।
देखना चाहते हो,
तो देखलो,
जल, जंगल और जमीन से खदेड़े गये,
उस मायुस इन्सान के कटे पाँव पर,
सत्य की पीड़ाओँ का इतिहास लिखा है।

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