Monday, September 17, 2018

ठूंठ. ‌.

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

रेखा की लंबाई को...

रेखा की लम्बाई को और कितना घटाओगे।
कितने बिँदु, कितने किरण पूँज, इन बिँदुमय रेखाओँ मेँ मिलाओगे॥
त्रिभुज, चतुर्भुज, बहुभुज, सम, ऋजु और न्युन,
ना जाने कितने कोण और भुजायेँ बनाओगे।
कितने लम्ब और स्पर्श रेखाओँ से,
इस वृत को विवृत दिखाओगे।
द्विआयामी, त्रिआयामी, बहुआयामी,
कितने त्रिविमीय चित्र सजाओगे॥
रेखा चित्र, माप चित्र, मान चित्र से कब तक मन बहलाओगे।
रेखायेँ तिलमिलाने लगी हैँ,
चित्र विद्रुपता, कुँठा और क्रुरता झलकाने लगे हैँ,
रंगोँ के चटकीले मेल से कब तक लुभाओगे।
कब तक अंग सौष्ठव से सहज प्रवृतियोँ को उकसाओगे॥
कमप्युटर और एनिमेशन की कला से,
इन ठूँठ और बेजान सी, जीवित गठरियोँ की, गड्ढोँ मेँ धँसी,
बेपनीली आँखोँ मेँ कब तक सपने जगाओगे।
जातीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की सीमा रेखाओँ मेँ,
भूख से कुलबुलाते पेट को,
कब तक गौरव और गरीमा के पाठ पढाओगे॥
मल्टी नेशनल को और कितना मल्टी प्रोफेसनल बनाओगे।
धर्म, जाति, कुल, वंश परम्परा, भाषा भेद और रंग भेद से,
कितने और नये बाजार सजाओगे॥
प्रतिद्वन्द और प्रतियोगिता के नाम पर,
कितने और नये विज्ञापन दिखाओगे।
पूर्व की लाली को देखो, नया सूरज निकलने वाला है।
- प्यारेलाल भाम्बू-

जुमलेबाज...

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

मृग मरीचिका...

मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने,

कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ।
उड़ती धूल के दर्पण मेँ,
दहकते अंगारोँ सी,
विचलित इन किरणोँ ने,
पानी से लबालब झील की झलकी दिखा,
कितनी बार प्यासे मृगोँ से कुलाचेँ लगवाई हैँ॥

 यथार्थ के जलते टीलोँ से टकरा कर मर जाना,
बेहतर है शायद,
इस आभासी झील के झिलमिलाते,
बहुरुपिये पानी से।

डकैतोँ की डकैती,
शायद नहीँ है बुरी,
शब्दोँ के मकड़जाल मेँ उलझी,
इस मायावी विकास की कहानी से॥

निश्चय ही कौए की चोँच से छीना जायेगा,
रोटी का टुकड़ा।
काश, समझ पाते,
 कि प्रवंचना की तलवार है,

मीठे सुर और संगीत  का यह मुखड़ा॥

तानसेन बनने के मोह मेँ,

हर बार सच मानलेते हो,

चालाक लोमड़ी की प्रशँसा और वादोँ को।
फिर से समझना होगा,
इन शब्दोँ के अर्थ और इरादोँ को॥

छलना के छलछलाते सागर मेँ कब तक डुबकी लगाओगे।

मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो,

कैसे तट के कगार को छू पाओगे?

अब हाथ पैर हिलाने ही होँगे,

लहरोँ से हौसलेँ टकराने ही होँगे,
देख,
आग मेँ अपना जिश्म जलाकर परवाना,

शमाँ के गरुर को चाहता है झुकाना,

रक्त की लालिमा ले,
अंधेरे के आँचल को चिर,

वह देख,
 नया सूरज निकल आया है।

चिड़ियोँ की चहचहाट मेँ,
जालिमोँ से लोहा लेने,

बलात्कार की शिकार,
उषा की अरुणाई ने,

लाने को नया इँकलाब,
हाथोँ मेँ लाल झँडा उठाया है॥
--------  प्यारेलाल भाम्बू ---------

Friday, March 23, 2018

कुछ गीत लिखें थे..


कुछ गीत लिखे थे नाम पर तेरे,







उन गीतों की सौगात है यह,


दिल से निकली आहों  का

दिल से निकली आहों का,

Tuesday, April 16, 2013

The writer: The writer is ready to welcome friends all over th...

The writer: The writer is ready to welcome friends all over th...: The writer is ready to welcome friends all over the world to debate on the issue of honor killing in south Asia and particularly in India a...