Thursday, September 27, 2018

शहीदे -आजम भगतसिंह की याद में..

॰॰॰-  शहीदे-आजम भगतसिँह की याद मेँ-॰॰॰

--
बाल सूर्य की प्रथम रश्मि,
मुसकायी मंदिम मंदिम।
उषा-काल के आँचल मेँ,
आसमान के विकल विरल मेँ।
मानवता का मन भावन।
गूँज उठा सहगान।
हो मुदित प्रकृति ने किया नव जीवन आव्हान।

इतिहास मेँ बेजोड़ है।
नव भारत का मोड़ है।
सन उन्नीस सौ सात का उर्मिल प्रभात।
लायलपुर पंजाब मेँ हुये भगतसिँह अवदात।
बंगा मेँ रहता था, सरदार किशनसिँह परिवार।
भगतसिँह जन्मे वहाँ अट्ठाईस सितम्बर शनिवार।

मेहनतकस के मान को सीँचा जिसने खून से।
फाँसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से।
शोषण की भट्टी मेँ संकटग्रस्त हो सर्वहारा।
साम्राज्यवादी खेमा सारा,जब जुल्म की आँधी लाये।
शोषक सत्ता के शैतान जब कहर पीड़ित पर ढायेँ।

लोकतन्त्र का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है।
इंकलाब की ले हूँकार तब भगतसिँह आ जाता है।

कफन बाँध निज नौजवान, जब जब ललकारा है।
तानाशाही ताकत का मनोबल सदा चीखा चित्कारा है।
क्रांतिदूत भगतसिँह भूला कभी न जायेगा।
क्रांति पथ का हर पथिक उन्हेँ श्रद्धा सुमन चढायेगा।
........ प्यारेलाल भाम्बू .  ...

नहीँ भूलेगा, कांटोँ के आगोश मेँ, सहज चटक कर खिलना। डाली के शिखर पर, शान से इठलाने को, कब रोक पाता है, तीक्ष्ण धार वाले, कांटोँ का हिलना॥ क्रुरता के कषैले आँसुओँ को पीकर, जीवन की धूप को, चटक लाल रंग देने, गुलाब के फूल से, खुशहाली के सुरुचिपूर्ण, साम्यवादी समाज के सपने को साकार करने वाले, असंख्य शहीदोँ की शहादत को गौरवान्वित करने, कांटोँ वाली झाड़ी मेँ खिलता रहेगा, यह गुलाब का फूल।


जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Wednesday, September 26, 2018

नफरत की बुनियाद. ‌.

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

गलाउकस

गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
 एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
 कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
 उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
 ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥

गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
 विद्रोह का पाठ,
 जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥

गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
 नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो  अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥

॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

ठूंठ

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

न मानुंगा हार..

ठूँठ से नीरस जीवन से दूर,
 कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
  ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
    लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
 पानी ही तो है,
 जो हर जीवन का आधार है॥
 नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
 फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
 खुद को मिटा,
 यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
 पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
 जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
  अरे ओ पागल दीवाने,
 क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
  यह दुनिया न समझेगी,
 तेरी कुर्बानी का गम॥
 पीव पीव पुकारो,
 उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
 अन्याय के आतप से झुलसे,
 मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
 कितने ढाओगी जुल्म,
 ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
 समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
 तेरी हूक मेँ,
 मैँ भी सुर मिलाउँगा।
  न मानुंगा हार,
 मैँ पागल कवि,
 इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥