Wednesday, September 26, 2018

न मानुंगा हार..

ठूँठ से नीरस जीवन से दूर,
 कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
  ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
    लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
 पानी ही तो है,
 जो हर जीवन का आधार है॥
 नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
 फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
 खुद को मिटा,
 यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
 पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
 जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
  अरे ओ पागल दीवाने,
 क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
  यह दुनिया न समझेगी,
 तेरी कुर्बानी का गम॥
 पीव पीव पुकारो,
 उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
 अन्याय के आतप से झुलसे,
 मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
 कितने ढाओगी जुल्म,
 ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
 समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
 तेरी हूक मेँ,
 मैँ भी सुर मिलाउँगा।
  न मानुंगा हार,
 मैँ पागल कवि,
 इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥

पहली बार...

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Monday, September 17, 2018

जुमलेबाज. ‌.

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
 सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,

और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
 उलटे नहीँ लटकाये जाते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
 गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
 दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
 बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
 हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?

जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।

जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!

सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?

 .............. प्यारेलाल भाम्बू ............

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।पर यथार्थ कि...

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि...
: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है। पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने, कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ। उड़ती धूल के दर्पण मेँ, दहकत...

आ तुझे खुशी का सहज आभास. ‌.

आ तुझे खुशी का सहज आभास कराने वाली,
 किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,

हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
 अन्दाज सिखाऊँ॥

भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,

घनचक्कर बने इन्सान ने,

धर्म, राष्ट्रीयता,
 जाति और प्रजाति के नाम से,

स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
 रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥

आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।

गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
 
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥

अरे ओ गुँगे,
 पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------

नफरत की बुनियाद...

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।