Thursday, September 27, 2018

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Wednesday, September 26, 2018

नफरत की बुनियाद. ‌.

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

गलाउकस

गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
 एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
 कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
 उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
 ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥

गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
 विद्रोह का पाठ,
 जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥

गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
 नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो  अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥

॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

ठूंठ

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

न मानुंगा हार..

ठूँठ से नीरस जीवन से दूर,
 कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
  ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
    लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
 पानी ही तो है,
 जो हर जीवन का आधार है॥
 नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
 फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
 खुद को मिटा,
 यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
 पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
 जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
  अरे ओ पागल दीवाने,
 क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
  यह दुनिया न समझेगी,
 तेरी कुर्बानी का गम॥
 पीव पीव पुकारो,
 उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
 अन्याय के आतप से झुलसे,
 मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
 कितने ढाओगी जुल्म,
 ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
 समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
 तेरी हूक मेँ,
 मैँ भी सुर मिलाउँगा।
  न मानुंगा हार,
 मैँ पागल कवि,
 इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥

पहली बार...

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

पहली बार

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -