Monday, September 17, 2018

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।पर यथार्थ कि...

The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि...
: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है। पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने, कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ। उड़ती धूल के दर्पण मेँ, दहकत...

आ तुझे खुशी का सहज आभास. ‌.

आ तुझे खुशी का सहज आभास कराने वाली,
 किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,

हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
 अन्दाज सिखाऊँ॥

भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,

घनचक्कर बने इन्सान ने,

धर्म, राष्ट्रीयता,
 जाति और प्रजाति के नाम से,

स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
 रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥

आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।

गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
 
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥

अरे ओ गुँगे,
 पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------

नफरत की बुनियाद...

नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
 मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?

फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?

बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
 कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।

नमक के ढेलों से...

नमक के ढेलोँ से,
हीरे तराशने चले हो।
झूठ और फरेब के बाजार मेँ,
सत्य को तलाशने चले हो।
चेहरोँ पर लिखी,
चिन्ता की लकीरेँ,
दर्द मेँ डूबी,
जंगी फन फरेबी,
हमदर्द तकरीरेँ,
यहाँ इल्म सियासतदान,
बाजाब्ता,
जिन्सी माल की तरह परोसते हैँ।
अदना सा,
 बैजहार सच का पुतला,
बाजार के कोने वाले पीपल की छाँव मेँ,
बैसाखी पर ठुड्डी टिकाये,
टुकर टुकर,
सलतनत ए आवाम का अंजाम देख रहा है।
देखना चाहते हो,
तो देखलो,
जल, जंगल और जमीन से खदेड़े गये,
उस मायुस इन्सान के कटे पाँव पर,
सत्य की पीड़ाओँ का इतिहास लिखा है।

गलाउकस...

गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
 एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
 कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
 उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
 ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥

गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
 विद्रोह का पाठ,
 जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥

गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
 नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो  अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥

॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

ठूंठ. ‌.

ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ  ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥

रेखा की लंबाई को...

रेखा की लम्बाई को और कितना घटाओगे।
कितने बिँदु, कितने किरण पूँज, इन बिँदुमय रेखाओँ मेँ मिलाओगे॥
त्रिभुज, चतुर्भुज, बहुभुज, सम, ऋजु और न्युन,
ना जाने कितने कोण और भुजायेँ बनाओगे।
कितने लम्ब और स्पर्श रेखाओँ से,
इस वृत को विवृत दिखाओगे।
द्विआयामी, त्रिआयामी, बहुआयामी,
कितने त्रिविमीय चित्र सजाओगे॥
रेखा चित्र, माप चित्र, मान चित्र से कब तक मन बहलाओगे।
रेखायेँ तिलमिलाने लगी हैँ,
चित्र विद्रुपता, कुँठा और क्रुरता झलकाने लगे हैँ,
रंगोँ के चटकीले मेल से कब तक लुभाओगे।
कब तक अंग सौष्ठव से सहज प्रवृतियोँ को उकसाओगे॥
कमप्युटर और एनिमेशन की कला से,
इन ठूँठ और बेजान सी, जीवित गठरियोँ की, गड्ढोँ मेँ धँसी,
बेपनीली आँखोँ मेँ कब तक सपने जगाओगे।
जातीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की सीमा रेखाओँ मेँ,
भूख से कुलबुलाते पेट को,
कब तक गौरव और गरीमा के पाठ पढाओगे॥
मल्टी नेशनल को और कितना मल्टी प्रोफेसनल बनाओगे।
धर्म, जाति, कुल, वंश परम्परा, भाषा भेद और रंग भेद से,
कितने और नये बाजार सजाओगे॥
प्रतिद्वन्द और प्रतियोगिता के नाम पर,
कितने और नये विज्ञापन दिखाओगे।
पूर्व की लाली को देखो, नया सूरज निकलने वाला है।
- प्यारेलाल भाम्बू-