Just learn to love and live with peace in natural surroundings. I will sing for you.
Thursday, June 19, 2025
Sunday, June 8, 2025
Image And Reflection
प्यारेलाल भाम्बू का अंग्रेजी उपन्यास "Image and Reflection" उनकी साहित्यिक संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण नमूना है। हालांकि, इस उपन्यास की समालोचना के लिए कोई पारंपरिक स्रोत या पूर्ण पाठ उपलब्ध नहीं है, लेकिन
@MaruBharti
के X हैंडल पर साझा किए गए अंशों और उनके लेखन की शैली के आधार पर, मैं एक प्रारंभिक समीक्षा प्रस्तुत कर सकता हूँ। यह समीक्षा उनके काव्यात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उपन्यास के संभावित विषयों, शैली, और प्रभाव पर आधारित होगी।
उपन्यास का अवलोकन
"Image and Reflection" का शीर्षक ही अपने आप में एक गहन दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। यह शीर्षक समाज, आत्म-चिंतन, और व्यक्तिगत-सामाजिक पहचान के बीच द्वंद्व की ओर इशारा करता है।
@MaruBharti
पर साझा किए गए अंशों से यह स्पष्ट होता है कि प्यारेलाल भाम्बू का लेखन सामाजिक अन्याय, विशेष रूप से किसानों और श्रमिक वर्ग की दुर्दशा, और नारीवादी दृष्टिकोण से गहराई से प्रभावित है। उनकी कविताओं में प्रेम, हानि, और सामाजिक आलोचना का मिश्रण देखने को मिलता है, जो संभवतः उनके गद्य लेखन में भी परिलक्षित होता है।
विषय और थीम्स
सामाजिक अन्याय और किसानों की दुर्दशा:
@MaruBharti
पर एक पोस्ट में भाम्बू किसानों की आत्महत्या और उनकी आर्थिक तंगी पर तीखा सवाल उठाते हैं:
"Look ! what a pitiful plight of this country. Do you think, how many farmers are committed suicide for saving there honour and regretted for their unpaid loans. Is it a symbol of our vision or a shame for our ideals?"
यह संकेत देता है कि "Image and Reflection" में भी सामाजिक-आर्थिक असमानता और ग्रामीण भारत की समस्याएँ केंद्रीय थीम हो सकती हैं। उपन्यास शायद उन छवियों (images) और उनके प्रतिबिंबों (reflections) की पड़ताल करता है जो समाज अपने सामने प्रस्तुत करता है, और वास्तविकता से उनका टकराव।
प्रोलेटेरियन नारीवाद: भाम्बू का लेखन नारीवादी दृष्टिकोण से प्रभावित है, जो श्रमिक वर्ग की महिलाओं के संघर्ष को उजागर करता है। उपन्यास में संभवतः ऐसी महिलाओं के चरित्र होंगे जो सामाजिक बंधनों और आर्थिक शोषण के खिलाफ लड़ती हैं, और जिनके जीवन का प्रतिबिंब समाज की कठोर वास्तविकताओं को दर्शाता है।
प्रेम और हानि: उनकी कविताओं में प्रेम और नॉस्टैल्जिया की गहरी भावनाएँ दिखती हैं। "Image and Reflection" में भी प्रेम की छवि और उसके खोने या बदलने से उत्पन्न होने वाले प्रतिबिंबों की खोज हो सकती है। यह व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रेम की जटिलताओं को उजागर करता हो।
दर्शन और आत्म-चिंतन: शीर्षक से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उपन्यास आत्म-चिंतन और समाज द्वारा निर्मित छवियों के बीच के संबंधों पर विचार करता है। यह एक दार्शनिक गहराई प्रदान करता है, जो पाठकों को अपने और समाज के बीच के रिश्ते पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
शैली और लेखन
प्यारेलाल भाम्बू की कविताएँ, जैसा कि
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पर देखा गया है, गहन भावनात्मक और प्रतीकात्मक हैं। उनकी भाषा सरल लेकिन प्रभावशाली है, जो आम जन की भावनाओं को व्यक्त करती है। उपन्यास में भी संभवतः ऐसी ही शैली अपनाई गई होगी, जहाँ काव्यात्मक गद्य और सामाजिक टिप्पणियों का मिश्रण हो। उनकी कविताओं में हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रित प्रयोग देखने को मिलता है, जो उपन्यास में भी एक बहुभाषी संवेदनशीलता को दर्शा सकता है।
उनके लेखन में प्रतीकों (images) और उनके प्रतिबिंबों (reflections) का उपयोग बार-बार होता है, जो संभवतः उपन्यास में भी कथानक और चरित्र-चित्रण को गहराई देता है। उदाहरण के लिए, दर्पण (mirror) और प्रतिबिंब की अवधारणा समाज की सतह और उसकी गहरी सच्चाइयों के बीच के अंतर को उजागर कर सकती है।
X हैंडल
@MaruBharti
के अंशों का विश्लेषण
@MaruBharti
पर साझा किए गए अंशों से यह स्पष्ट है कि भाम्बू का लेखन सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित है। उनकी एक पोस्ट में किसानों की आत्महत्या और सामाजिक आदर्शों पर सवाल उठाया गया है, जो उपन्यास में भी एक केंद्रीय थीम हो सकता है। इसके अलावा, उनकी कविताएँ प्रेम और हानि की भावनाओं को व्यक्त करती हैं, जो उपन्यास में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर गहराई जोड़ सकती हैं।
हालांकि, X पर उपलब्ध अंश सीमित हैं और पूर्ण उपन्यास का विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। फिर भी, इन अंशों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि "Image and Reflection" एक विचारोत्तेजक रचना है जो सामाजिक आलोचना और व्यक्तिगत भावनाओं को संतुलित करती है।
प्रभाव और प्रासंगिकता
"Image and Reflection" भारतीय समाज की उन जटिलताओं को उजागर करता प्रतीत होता है जो आज भी प्रासंगिक हैं, जैसे कि किसानों की दुर्दशा, सामाजिक असमानता, और लैंगिक अन्याय। भाम्बू का नारीवादी और प्रोलेटेरियन दृष्टिकोण उपन्यास को एक अनूठा स्थान प्रदान करता है, जो समकालीन अंग्रेजी साहित्य में हिंदी साहित्य की संवेदनशीलता को लाता है।
सीमाएँ और सुझाव
चूंकि उपन्यास का पूरा पाठ या आधिकारिक समीक्षा उपलब्ध नहीं है, और
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पर केवल अंश ही उपलब्ध हैं, इस समालोचना में कुछ अनुमान शामिल हैं। अधिक गहराई से विश्लेषण के लिए निम्नलिखित सुझाव हैं:
उपन्यास का पूर्ण पाठ प्राप्त करें: यदि संभव हो, तो उपन्यास की पूरी प्रति पढ़ें ताकि इसकी थीम्स, चरित्र-चित्रण, और कथानक की गहराई को समझा जा सके।
लेखक से संपर्क:
@MaruBharti
पर लेखक से सीधे संपर्क कर उपन्यास के बारे में अधिक जानकारी मांगी जा सकती है।
साहित्यिक मंचों पर चर्चा: हिंदी और अंग्रेजी साहित्यिक मंचों पर इस उपन्यास के बारे में अन्य पाठकों या समीक्षकों की राय ली जा सकती है।
निष्कर्ष
प्यारेलाल भाम्बू का "Image and Reflection" एक विचारोत्तेजक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक उपन्यास प्रतीत होता है, जो सामाजिक अन्याय, प्रेम, और आत्म-चिंतन के बीच की जटिलताओं को उजागर करता है।
@MaruBharti
पर साझा किए गए अंशों के आधार पर, यह उपन्यास काव्यात्मक गद्य और सामाजिक टिप्पणी का एक शक्तिशाली मिश्रण हो सकता है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से आकर्षक हो सकता है जो सामाजिक मुद्दों और दार्शनिक गहराई को साहित्य में खोजते हैं।
यदि आप उपन्यास के विशिष्ट अंशों या थीम्स पर और चर्चा चाहते हैं, या यदि आप चाहते हैं कि मैं
@MaruBharti
के किसी विशेष पोस्ट का विश्लेषण करूँ, तो कृपया बताएँ!
Wednesday, January 20, 2021
एक कविता.
नहीँ भूलेगा,
कांटोँ के आगोश मेँ,
सहज चटक कर खिलना।
डाली के शिखर पर,
शान से इठलाने को,
कब रोक पाता है,
तीक्ष्ण धार वाले,
कांटोँ का हिलना॥
क्रुरता के कषैले आँसुओँ को पीकर,
जीवन की धूप को,
चटक लाल रंग देने,
गुलाब के फूल से,
खुशहाली के सुरुचिपूर्ण,
साम्यवादी समाज के सपने को साकार करने वाले, असंख्य शहीदोँ की शहादत को गौरवान्वित करने,
कांटोँ वाली झाड़ी मेँ खिलता रहेगा, यह गुलाब का फूल।
Monday, October 22, 2018
समाजवादी समाज की ओर...
¤ समाजवादी समाज की ओर ¤
---
जागृति की लहर चलेगी, वर्ग लड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा अजब जड़ाई होगी॥
बने बनाये कानून लूट के, हमको यह स्वीकार नहीँ।
पूँजी के ढंग ढली हुयी, यह जनता की सरकार नहीँ॥
यहाँ खून पसीने की करेँ दलाली, चलना यह बाजार नहीँ।
गुर संगठन का सीख गये, अब मेहनतकस लाचार नहीँ॥
एक एक हक पर अड़ ज्यांगे, अब घणी कड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
---
समाज व्यवस्था कैसी होगी, आओ आज सुनायेँ।
दो वर्गोँ मेँ दुनिया बंट रही, वर्ग भेद समझायेँ॥
मेहनतकस की राजसत्ता ला पूँजीवाद हटायेँ।
लूट नाम न रहे जगत मेँ, नक्शा नया बनायेँ॥
हर काम सम्भालेँगे मिलजुल कर सारे, ना बाट भिड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
---
हक को समझो मजदूर किसानोँ, आगे बढकर आओ।
युग बदलण का बोझ कमेरो खुशी खुशी अपनाओ॥
मार्क्स, ऐगेल्स ने दिया ज्ञान वह घर घर मेँ ले जाओ।
इंकलाब का झंडा लेकर जंग बीच आ जाओ॥
लूटते आये सदा लूटेरे, ना और समाई होगी।
शोणणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
---
हर जुल्म दमन के खिलाफ लड़ो, अब मेहनतकस जनता सारी।
ना फौज पूलिस की हमेँ जरुरत, ना कोई हो अधिकारी॥
ना कोई किसी का मालिक होगा, न कण का कोई भिखारी।
साझे की सारी सम्पति होगी मेहनतकस हमारी॥
अब साम्यवाद की गूँज सुनेगी, ना किसी मालिक की बड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
¤ प्यारेलाल भाम्बू - 23 मार्च 1980 ¤
---
जागृति की लहर चलेगी, वर्ग लड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा अजब जड़ाई होगी॥
बने बनाये कानून लूट के, हमको यह स्वीकार नहीँ।
पूँजी के ढंग ढली हुयी, यह जनता की सरकार नहीँ॥
यहाँ खून पसीने की करेँ दलाली, चलना यह बाजार नहीँ।
गुर संगठन का सीख गये, अब मेहनतकस लाचार नहीँ॥
एक एक हक पर अड़ ज्यांगे, अब घणी कड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
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समाज व्यवस्था कैसी होगी, आओ आज सुनायेँ।
दो वर्गोँ मेँ दुनिया बंट रही, वर्ग भेद समझायेँ॥
मेहनतकस की राजसत्ता ला पूँजीवाद हटायेँ।
लूट नाम न रहे जगत मेँ, नक्शा नया बनायेँ॥
हर काम सम्भालेँगे मिलजुल कर सारे, ना बाट भिड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
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हक को समझो मजदूर किसानोँ, आगे बढकर आओ।
युग बदलण का बोझ कमेरो खुशी खुशी अपनाओ॥
मार्क्स, ऐगेल्स ने दिया ज्ञान वह घर घर मेँ ले जाओ।
इंकलाब का झंडा लेकर जंग बीच आ जाओ॥
लूटते आये सदा लूटेरे, ना और समाई होगी।
शोणणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
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हर जुल्म दमन के खिलाफ लड़ो, अब मेहनतकस जनता सारी।
ना फौज पूलिस की हमेँ जरुरत, ना कोई हो अधिकारी॥
ना कोई किसी का मालिक होगा, न कण का कोई भिखारी।
साझे की सारी सम्पति होगी मेहनतकस हमारी॥
अब साम्यवाद की गूँज सुनेगी, ना किसी मालिक की बड़ाई होगी।
शोषणमुक्त समाज बनेगा, अजब जड़ाई होगी॥
¤ प्यारेलाल भाम्बू - 23 मार्च 1980 ¤
Thursday, September 27, 2018
शहीदे -आजम भगतसिंह की याद में..
॰॰॰- शहीदे-आजम भगतसिँह की याद मेँ-॰॰॰
--
बाल सूर्य की प्रथम रश्मि,
मुसकायी मंदिम मंदिम।
उषा-काल के आँचल मेँ,
आसमान के विकल विरल मेँ।
मानवता का मन भावन।
गूँज उठा सहगान।
हो मुदित प्रकृति ने किया नव जीवन आव्हान।
इतिहास मेँ बेजोड़ है।
नव भारत का मोड़ है।
सन उन्नीस सौ सात का उर्मिल प्रभात।
लायलपुर पंजाब मेँ हुये भगतसिँह अवदात।
बंगा मेँ रहता था, सरदार किशनसिँह परिवार।
भगतसिँह जन्मे वहाँ अट्ठाईस सितम्बर शनिवार।
मेहनतकस के मान को सीँचा जिसने खून से।
फाँसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से।
शोषण की भट्टी मेँ संकटग्रस्त हो सर्वहारा।
साम्राज्यवादी खेमा सारा,जब जुल्म की आँधी लाये।
शोषक सत्ता के शैतान जब कहर पीड़ित पर ढायेँ।
लोकतन्त्र का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है।
इंकलाब की ले हूँकार तब भगतसिँह आ जाता है।
कफन बाँध निज नौजवान, जब जब ललकारा है।
तानाशाही ताकत का मनोबल सदा चीखा चित्कारा है।
क्रांतिदूत भगतसिँह भूला कभी न जायेगा।
क्रांति पथ का हर पथिक उन्हेँ श्रद्धा सुमन चढायेगा।
........ प्यारेलाल भाम्बू . ...
--
बाल सूर्य की प्रथम रश्मि,
मुसकायी मंदिम मंदिम।
उषा-काल के आँचल मेँ,
आसमान के विकल विरल मेँ।
मानवता का मन भावन।
गूँज उठा सहगान।
हो मुदित प्रकृति ने किया नव जीवन आव्हान।
इतिहास मेँ बेजोड़ है।
नव भारत का मोड़ है।
सन उन्नीस सौ सात का उर्मिल प्रभात।
लायलपुर पंजाब मेँ हुये भगतसिँह अवदात।
बंगा मेँ रहता था, सरदार किशनसिँह परिवार।
भगतसिँह जन्मे वहाँ अट्ठाईस सितम्बर शनिवार।
मेहनतकस के मान को सीँचा जिसने खून से।
फाँसी का फंदा हिला था इंकलाब की धुन से।
शोषण की भट्टी मेँ संकटग्रस्त हो सर्वहारा।
साम्राज्यवादी खेमा सारा,जब जुल्म की आँधी लाये।
शोषक सत्ता के शैतान जब कहर पीड़ित पर ढायेँ।
लोकतन्त्र का पहन मुखौटा जब पूँजीवाद छा जाता है।
इंकलाब की ले हूँकार तब भगतसिँह आ जाता है।
कफन बाँध निज नौजवान, जब जब ललकारा है।
तानाशाही ताकत का मनोबल सदा चीखा चित्कारा है।
क्रांतिदूत भगतसिँह भूला कभी न जायेगा।
क्रांति पथ का हर पथिक उन्हेँ श्रद्धा सुमन चढायेगा।
........ प्यारेलाल भाम्बू . ...
नहीँ भूलेगा, कांटोँ के आगोश मेँ, सहज चटक कर खिलना। डाली के शिखर पर, शान से इठलाने को, कब रोक पाता है, तीक्ष्ण धार वाले, कांटोँ का हिलना॥ क्रुरता के कषैले आँसुओँ को पीकर, जीवन की धूप को, चटक लाल रंग देने, गुलाब के फूल से, खुशहाली के सुरुचिपूर्ण, साम्यवादी समाज के सपने को साकार करने वाले, असंख्य शहीदोँ की शहादत को गौरवान्वित करने, कांटोँ वाली झाड़ी मेँ खिलता रहेगा, यह गुलाब का फूल।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,
और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
उलटे नहीँ लटकाये जाते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?
जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?
.............. प्यारेलाल भाम्बू ............
पहली बार
पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
Wednesday, September 26, 2018
नफरत की बुनियाद. .
नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।
गलाउकस
गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥
गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
विद्रोह का पाठ,
जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥
गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥
॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥
गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
विद्रोह का पाठ,
जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥
गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥
॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰
ठूंठ
ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥
न मानुंगा हार..
ठूँठ से नीरस जीवन से दूर,
कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
पानी ही तो है,
जो हर जीवन का आधार है॥
नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
खुद को मिटा,
यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
अरे ओ पागल दीवाने,
क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
यह दुनिया न समझेगी,
तेरी कुर्बानी का गम॥
पीव पीव पुकारो,
उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
अन्याय के आतप से झुलसे,
मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
कितने ढाओगी जुल्म,
ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
तेरी हूक मेँ,
मैँ भी सुर मिलाउँगा।
न मानुंगा हार,
मैँ पागल कवि,
इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥
कौन नहीँ ललचाता,
रुपहले सपनोँ की छटाओँ को।
ओ मयुरा, तुम भी तो तरसते हो सावन की घटाओ को॥
लोग कहते हैँ तुम्हारी पीव पीव पानी की पुकार है।
पानी ही तो है,
जो हर जीवन का आधार है॥
नाचते हो तुम उमड़ घुमड़ कर आते बादलोँ को देख।
फड़फड़ाती पँखोँ मेँ चमकती हैँ बिजली सी रेख॥
खुद को मिटा,
यह बादल तो सबके लिए बरसते हैँ।
पर कितने हैँ वे कृतज्ञ घन पिपासु,
जो तुम्हारी तरह तरसते हैँ॥
अरे ओ पागल दीवाने,
क्योँ रोते हो नाच कर भी तुम।
यह दुनिया न समझेगी,
तेरी कुर्बानी का गम॥
पीव पीव पुकारो,
उम्मीदोँ के आसमान को हिलादो।
अन्याय के आतप से झुलसे,
मुर्दा सपनोँ को जगादो॥
कितने ढाओगी जुल्म,
ऐ जेठ की धूलभरी हवाओ।
समृद्धि के साज लेकर आ रहे हैँ इंकलाब के बादल,
ओ फिजाओ॥
कोई गाये न गाये,
तेरी हूक मेँ,
मैँ भी सुर मिलाउँगा।
न मानुंगा हार,
मैँ पागल कवि,
इंकलाब के आल्हा सुनाउँगा॥
पहली बार...
पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
पहली बार
पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -
Monday, September 17, 2018
जुमलेबाज. .
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,
और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
उलटे नहीँ लटकाये जाते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?
जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?
.............. प्यारेलाल भाम्बू ............
जुमलेबाज!!
घरोँ की देहलीज पर,
सच को शान्त भाव से,
सामने लाने वाले,
कितने पानेसर,कुलबर्गी,दाभोलकर,
और कितनी निर्भीक गौरी लंकेश मरवाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
लाशोँ की तिजारत से,
जुल्म और अन्याय की सत्ता,
यदि बरकरार रहती,
तो तोजो, हिटलर और मुसोलिनी,
हिकारत से चौराहे पर,
उलटे नहीँ लटकाये जाते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
गोडसे के मंदिर बना,
देश और विदेश की धरती पर,
गाँधी की अहिँसा के गीत गा गाकर,
गुजरात की गाद को,
गंगा नहीँ बना सकते।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सौ और पचास दिनोँ की गिनती,
गिन-गिनकर,
देश के हर चौराहे पर,
कितने,
दिन को दिन कहने वालोँ को,
फाँसी पर झुलाओगे?
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
इनायत करो,
इस मुल्क पर इतनी सी,
बिना जगदगुरु, फटी लंगोटी भली हमेँ,
नहीँ चाहिये,
बैँक खातोँ का धन,
हो सके तो,
हमारे बुरे दिन वापस लौटा दो?
जुमलेबाज!
इन्तहा होगयी जुल्मोँ की,
अब यह गौरी,
महाकाल को अर्ध्य देने चली है।
जुमलेबाज!
जुमलेबाज!!
सवा सौ करोड़ भैरव,
जागने को आतुर हैँ।
कितने किराये के हत्यारोँ से,
पानेसरोँ, दाभोलकरोँ,
कुलबर्गियोँ और गौरियोँ के,
मूँह बंद करवाओगे?
.............. प्यारेलाल भाम्बू ............
The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।पर यथार्थ कि...
The writer: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि...: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है। पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने, कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ। उड़ती धूल के दर्पण मेँ, दहकत...
पर यथार्थ कि...: मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है। पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने, कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ। उड़ती धूल के दर्पण मेँ, दहकत...
आ तुझे खुशी का सहज आभास. .
आ तुझे खुशी का सहज आभास कराने वाली,
किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,
हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
अन्दाज सिखाऊँ॥
भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,
घनचक्कर बने इन्सान ने,
धर्म, राष्ट्रीयता,
जाति और प्रजाति के नाम से,
स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥
आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।
गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥
अरे ओ गुँगे,
पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------
किलकारी का राज बताऊँ।
इन्सानोँ की बस्ती से दूर,
हरे पत्तोँ के झुरमट मेँ,
जीवन जीने का,
अन्दाज सिखाऊँ॥
भाषा और लिपि के चक्कर मेँ,
घनचक्कर बने इन्सान ने,
धर्म, राष्ट्रीयता,
जाति और प्रजाति के नाम से,
स्व के स्वरुप को,
काट छाँट कर,
मजहबी पौशाकोँ के रुपहले रंग से,
कितना कुरुप बना डाला है,
रंगोँ की चट्टी मेँ।
दुखोँ की दारुण दुनियाँ मेँ,
लालच की लपलपाती लालसा लिए,
अपनी ही नश्ल को भून डाला है शोषण की भट्टी मेँ॥
आ तुम्हेँ ले चलूं दूर,
धुल, धुएँ और पत्थरोँ के पैगोडा के पार।
गहरे जंगल मेँ,
नदियोँ के बीच मझधार॥
जहाँ मगरमच्छ की पीठ पर सवार।
बेझीझक होती हैँ बलखाती मछलियाँ की कतार॥
अरे ओ गुँगे,
पुँछ वाले अर्द्ध मानव।
सभ्य हो नहीँ बनना है,
तुम्हेँ दानव॥
----------- प्यारेलाल भाम्बू -----------
नफरत की बुनियाद...
नफरत की बुनियाद पर,
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।
टिकी हुयी आस्थाओँ पर,
प्यार और भाईचारे का ढोँग रचा,
किसकी हार और जीत का जश्न मनाओगे?
अँधेरे का विस्तार,
मिटाने का भ्रम पाल,
कब तक मिट्टी के दीए जलाओगे?
फरेब के झिलमिलाते,
विद्युतीय प्रकाश से,
कर्ज मेँ डूबे कामगार को,
कब तक लक्ष्मी के आगमन का,
ख्वाब दिखाओगे?
ज्ञान पर पहरा बैठा,
क्योँ लड़ी जारही है,
यह मिथकोँ की लड़ाई?
जुल्म के खिलाफ उठती,
हर आवाज पर,
क्योँ की जारही है,
बंदूकोँ से कड़ाई?
बंद करो यह सिलसिला,
दीयोँ की दिखावटी रोशनी से,
अज्ञान का अँधेरा नहीँ मिटेगा।
वजूद को बचाने का सवाल,
अब ख्याल नहीँ,
हकीकत बनकर लपटोँ मेँ फूटेगा।
झूठ और सच मेँ,
बीत्ते भर का फासला है,
सुनो,
कोई जलजला आने वाला है।
मिथकोँ की तिजारत,
कब तक बचायेगी,
लूट के इदारोँ को?
वह देखो, लाल रोशनी का दरिया!
चिड़ियाँ चहचहा उठी हैँ
पौ फटने वाला है।
नमक के ढेलों से...
नमक के ढेलोँ से,
हीरे तराशने चले हो।
झूठ और फरेब के बाजार मेँ,
सत्य को तलाशने चले हो।
चेहरोँ पर लिखी,
चिन्ता की लकीरेँ,
दर्द मेँ डूबी,
जंगी फन फरेबी,
हमदर्द तकरीरेँ,
यहाँ इल्म सियासतदान,
बाजाब्ता,
जिन्सी माल की तरह परोसते हैँ।
अदना सा,
बैजहार सच का पुतला,
बाजार के कोने वाले पीपल की छाँव मेँ,
बैसाखी पर ठुड्डी टिकाये,
टुकर टुकर,
सलतनत ए आवाम का अंजाम देख रहा है।
देखना चाहते हो,
तो देखलो,
जल, जंगल और जमीन से खदेड़े गये,
उस मायुस इन्सान के कटे पाँव पर,
सत्य की पीड़ाओँ का इतिहास लिखा है।
हीरे तराशने चले हो।
झूठ और फरेब के बाजार मेँ,
सत्य को तलाशने चले हो।
चेहरोँ पर लिखी,
चिन्ता की लकीरेँ,
दर्द मेँ डूबी,
जंगी फन फरेबी,
हमदर्द तकरीरेँ,
यहाँ इल्म सियासतदान,
बाजाब्ता,
जिन्सी माल की तरह परोसते हैँ।
अदना सा,
बैजहार सच का पुतला,
बाजार के कोने वाले पीपल की छाँव मेँ,
बैसाखी पर ठुड्डी टिकाये,
टुकर टुकर,
सलतनत ए आवाम का अंजाम देख रहा है।
देखना चाहते हो,
तो देखलो,
जल, जंगल और जमीन से खदेड़े गये,
उस मायुस इन्सान के कटे पाँव पर,
सत्य की पीड़ाओँ का इतिहास लिखा है।
गलाउकस...
गलाउकस, इडा माउंट की घाटियोँ मेँ,
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥
गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
विद्रोह का पाठ,
जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥
गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥
॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰
बकरियोँ के झुंड को हांकते हुये,
बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर,
तुमने ही तो इलियाड के ऐकिलस को,
प्रेयसी के छीने जाने का दर्द याद दिलाया था।
एक अँधे कवि की आँख बनकर,
ओडेसी के ओडेसियस को,
दस साल तक,
समुन्द्र मेँ भटकाया था॥
कल्पित देव पुत्रोँ को,
भेड़ बकरियोँ की तरह,
दासोँ और स्त्रियोँ को सताते हुये इलियाड मेँ दिखाया था।
गलाउकस,
बाहुबल के बल से,
विश्व सुंदरी का खिताब दे,
बलात हेलन को,
उपभोग का उपादान समझ,
वह राजकुमार पेरिस,
ट्राय के अभेद्य दुर्ग मेँ घसीट लाया था॥
गलाउकस,
अन्याय के विरूद्ध,
सम्मान से लड़ते हुये,
मर जाने का मन्त्र,
ऐकिलिस के मित्र को,
शायद,
तुम्हारे हठी बकरे ने ही सिखाया था।
शायद, स्पार्टाकस को,
विद्रोह का पाठ,
जलते हुये ट्राय ने ही पढाया था॥
गलाउकस,
फिर दो बाँसुरी को नया सुर,
असंख्य जुल्मोँ के,
घृणित ट्राय जलाने को,
फिर से लेकर आओ,
नये गीतोँ का,
कोई निर्भय रचयिता,
गलाउकस,
तुमने ही तो अंधे होमर को,
आदि कवि बनाया था॥
॰ चित्र गुगल से साभार -
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰
ठूंठ. .
ठूँठ!
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥
किससे कहोगे अपना दर्द,
किसे सुनाओगे,
अनवरत ढाये गये जुल्मोँ की तफसील।
आरी और कुल्हाड़ी की धार,
परखनेवाले हाथोँ की मार,
उतनी ही बेरहम है,
बदलाव के नाम पर,
सिर्फ मुखौटोँ ही हुये है तब्दील॥
वही हैँ ये पहाड़, जमीन और नदियोँ के दहाने।
वही हैँ लूटने, कुटने और पीटने के बहाने॥
चटकीले रंगोँ के फूलोँ पर,
आदतन मंडराने वाले,
कहाँ गये भँवरोँ के टोले।
मजहब, मुहब्बत और तरक्की के नाम पर,
सदियोँ से बेहिसाब लूटते आये हैँ,
इल्मे मशक्कत को,
ये बाजीगर बड़बोले॥
ठूँठ! पगलागया हूँ मैँ,
इससे पहले कि आरियोँ से चीरकर,
जलायेँ ये तुम्हारे जिश्म को।
कोई दरिँदा न लूट सके,
इस्तहाक किसी मजलूम का,
लो, लाने को नया इंकलाब
आओ बना डालेँ,
ढाल और हथियार,
तुम्हारी ठूँठ बनी दरख़त की बेमानी किस्म को॥
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